राम से भटके, हनुमान पर अटके

लगता है देश के पास शायद अब मुद्दे ही नहीं रह गए हैं। भाजपा ने हिंदु देवी-देवताओं का वर्गीकरण करने का मानो ठेका ही ले लिया है। यह अलग बात है कि तीन दशकों से भाजपा राम पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है और अब हनुमान को भी एक जाति विशेष का बता कर नया शिगूफा छोड़ दिया है। असर भी देखिए कि इधर भाजपा ने हनुमान को दलित वर्ग का बताया और उधर दलितों ने हनुमान मंदिरों पर अपना दाव भी ठोकना शुरू कर दिया। कैसी विडंबना है कि हाईटेक चुनाव प्रणाली अपनाने के लिए ईवीएम का प्रयोग तो हो रहा है लेकिन मुद्दों के नाम पर धार्मिक भावनाआें को भी भड़काने का काम चल रहा है। बेरोजगारी, विकास, किसान एवं दूसरे बुनियादी मुद्दों की ओर से आंखे बंद कर नेताओं को हनुमान, अल्लाह, राम पर अधिक विश्वास रह गया है। किसने सोचा था कि इन चुनावों में हनुमान जी का भी वर्गीकरण हो जाएगा। हनुमान भी शायद उम्मीद में रहें होंंगे की उनके आराध्य देव का अब तो मंदिर बन ही जाएगा लेकिन यहां तो कथित हिंदुओं की हितैषी पार्टी भाजपा ने हनुमानजी का ही वर्गीकरण कर दिया। असल में यही भारत की राजनीति का विशुद्घ रूप है। यहां मूल मुद्दों से जनता को भटका कर ऐसे विषयों में फंसाने का प्रयास किया जाता है जिनसे न तो विकास का कोई वास्ता है और न ही बुनियादी बातों के समाधान का। अब सोचिए कि आखिर क्या जरूरत थी कि हनुमानजी का जाति वर्गीकरण किया जाए, और किया भी तो दलित वर्ग का। क्या भाजपा के पास हनुमानजी का बर्थ सर्टिफिकेट या वंशावली है? मूल मुद्दों से भटक कर जनता को ऐसे विषयों की ओर ले जाना कहीं से भी लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं है। भाजपा राम मंदिर पर एक लंबे समय से मौन धारण किए हुए है। राम मंदिर को सिवाए चुनावी मुद्दा बनाने से अधिक पर भाजपा नेताओं को विश्वास नहीं रहा है। मुद्दों से भटक रही राजनीति को अच्छा नहीं माना जा सकता। खासतौर से ऐसे देश में जहां पहले से ही गरीबी, बेरोजगारी, दम तोड़ते किसान, धार्मिक उन्माद, छुआछूत, आतंकवाद जैसे मुद्दे सिर उठाए रहते हों वहां कैसे हमारे नेता धर्म को जबरन मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, इसका ज्वलंत उदाहरण राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ में हुई जनसभाओं में देखने को मिला। नोटबंदी, आतंकवाद, कालेधन पर जवाब देने के बजाए भाजपा के नेता हनुमानजी का वर्गीकरण करते दिखे तो कोई प्रधानमंत्री के माता-पिता पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूका। बयानों की तो ऐसी बहार हुई जिसने छिछोरों को भी शर्मसार कर दिया। क्या यही भूमिका है स्टार प्रचारकों की? ऐसे स्टार प्रचारकों से क्या भला होगा देश और समाज का। नेताआें को अपना चरित्र सुधारना ही होगा। ऐसे मुद्दे जबरन न उछालें जिसके बारे में न तो उन्हें ज्ञान हो। आखिर किस थ्योरी पर भाजपा नेताओं ने हनुमानजी को दलित वर्ग से जोड़ दिया, इसका स्पष्टीकरण ही देश के आगे रख दे भाजपा।

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