खुफिया तंत्र पर प्रश्न चिन्ह

रोहिंग्य मुसलमानों की भूमिका को लेकर पूरे देश में एक बहस छिड़ी हुई है। तमाम राजनीतिक संगठनों ने इन्हें लेकर राजनीति का खेल खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों का पूरे देश में यूं फैल जाना बेहद चिंता का विषय बनता जा रहा है। उत्तराखंड की शांत वादियां भी रोहिंग्या मुसलमानों की उपस्थिति से बच नहीं पाई है। देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में दो रोहिंग्या मुसलमानों के कई सालों से होने की पुष्टि हुई है। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन यह गिरफ्तारी अपने पीछे कई अहम सवाल छोड़ गयी है। उत्तराखंड बनने के बाद यहां की आंतरिक सुरक्षा को लेकर कई नीतियां बनाई गयीं थीं लेकिन आए दिन यहां सुरक्षा तंत्र की खामियां उजागर होती आई हैं। कभी माओवाद तो कभी चीनी घुसपैठ से उत्तराखंड देश की सुर्खियोंं में आता रहा है। बांग्लादेशी तो उत्तराखंड में बसे हुए ही है जिनकी सटीक जानकारी हमारी पुलिस के पास नहीं है। यही हाल प्रदेश के खुफिया तंत्र का भी है जो कि गहरी निंद्रा में सोया रहता है। महज जुलूसों एवं सरकारी संगठनों के धरनों-प्रदर्शनों तक ही सीमित हैै। इधर ताजा मामला पटेलनगर क्षेत्र में दो और बांग्लादेशी रोहिंग्या मुसलमानों के रहने की पुष्टि हुई हैं। हैरानी की बात तो यह है कि यह दोनों वर्षो से यहां रह रहे थे, और बकायदा इन लोगों ने ड्राईविंग लाईसेंस, आधार कार्ड एवं मतदाता पहचान पत्र तक जारी किए जा चुके हैं। यानी कि इन लोगों के बारे मे स्थानीय प्रशासन एवं थानों ने सत्यापन के दौरान केवल खानापूर्ति ही की, जिस कारण लंबे समय इन घुसपैठियों की पहचान छिपी रही। सबसे बड़ी चिंता तो अब पुलिस के सत्यापन संबंधी अभियानों को लेकर होने लगी है। महज अधिकारियों को दिखाने के लिए चलाए जाने वाले सत्यापन अभियानों की असली सूरत यही है। रही बात उत्तराखंड के खुफिया तंत्र की तो, इस विभाग की कार्यशैली तो हमेशा से ही विवादों एवं असफलताआें के घेरे में लिपटी पाई गयी है। प्रदेश के खुफिया तंत्र एवं इससे जुड़ी ईकाईयों ने कभी खुद को धरने-प्रदर्शनों एवं पासपोर्ट आदि की जांच से उपर उठने के लिए तैयार ही नहीं किया। अखबारों की सूचनाओं पर चलने वाले उत्तराखंड के खुफिया तंत्र को अभी खुद को प्रदेश की विषम परिस्थितियोंं के अनुसार ढालने का अनुभव नहीं हो पाया है। भारी-भरकम मैन पॉवर होने के बाद भी परिणाम ढाक के तीन पात। यह तो चंद ऐसे मामले हैं जो गाहे-बगाहे सामने आ जाते हैं, लेकिन पूरे प्रदेश में अभी न जाने कितने ही संदिग्ध कश्मीरी, बांग्लादेशी एवं माओवाद समर्थक होंगे जिनके बारे में स्थानीय पुलिस एवं खुफिया ईकाईयों को जानकारी तक नहीं है। सुरक्षा का पूरा तंत्र महज थाने-चौकियों तक ही सीमित है, जिनके पास पहले ही माननीयों की सेवा एवं बेगारी का काम है कि वह सत्यापन जैसे काम को केवल औपचारिकताओं के दायरे मे ही करते हैं। पुलिस मुख्यालय में बैठे हुक्मरानों को अपनी नीतियों में बाहरी घुसपैठियों से संबंधित विषयों को भी गंभीरता से जोड़ना चाहिए।

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