जीएसटी में फंसी सरकार

केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों में बड़े बदलाव का फैसला लिया है, जिसके तहत अब अलग-अलग वस्तुआें पर मानक दर वाला स्लैब बनाने की तैयारी की जा रही है। जीएसटी को लेकर शुरूआत से ही भ्रम की स्थिति बनी हुई थी जबकि जीएसटी के परिणामों को लेकर भी व्यापारी वर्ग में रोष बना हुआ था। जीएसटी के तहत पूरे देश में वस्तुओं पर एक कर प्रणाली लगाने की अवधारणा थी लेकिन कई उत्पादों पर जीएसटी के तहत कर नहीं लगाया गया जिसमे पैट्रोल, डीजल एवं रसोई गैस प्रमुख है। जीएसटी पर दोहरे मापदंडों के कारण सरकार विपक्ष के भी निशान पर है। उधर समय-समय पर केंद्र सरकार ने कुछ वस्तुआें को जीएसटी में कुछ राहत देने की घोषणा भी की लेकिन इससे स्थिति अधिक कुछ सुधरी नहीं,उल्टे जीएसटी के नाम पर विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं पर लूट-खसोट का काम भी चलता रहा। हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं, जिसके परिणाम कहीं से भी भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं आए। तीन राज्यों से भाजपा की सरकारें चली गयीं तो कुछ जगह दहाई के अंक तक पर भी नहीं पहुंच पाए। कहीं न कहीं केंद्र सरकार की नीतियों को इन पांच राज्यों की जनता ने स्वीकार नहीं किया। भले ही सरकार इस हार के लिए स्थानीय मुद्दों को अधिक प्रभावशाली बताए लेकिन नोटबंदी, भ्रष्टाचार, जीएसटी, आतंकवाद एवं विकास जैसे मुद्दों को लेकर जनता ने इस बार मोदी के नाम पर अधिक विश्वास नहीं किया। इस हार ने भाजपा को विभिन्न क्षेत्रों में मंथन करने पर विवश किया है जिसमें जीएसटी को अलग नहीं किया जा सकता। देश में एक बड़ा वर्ग व्यापारियों का है जो कि जीएसटी प्रणाली को व्यापार के लिए सही नहीं मानता। उस पर जीएसटी के भुगतान की प्रक्रिया भी जटिल लग रही है जो व्यापारियों को बार-बार विभागों के चक्कर कटवा रही है। केंद्र सरकार की समझ में यह आ चुका है कि यदि इसी प्रकार से चलता रहा तो मिशन 2019 की राह मुश्किल हो सकती है, लिहाजा कई उत्पादों को 28 फीसदी के टैक्स दायरे से बाहर लाने का फैसला लिया गया है। फिलहाल सरकार लग्जरी उत्पादों पर 28 फीसदी टैक्स ही रखेगी जबकि इससे अलग वस्तुआेंं को टैक्स में राहत दी जाएगी। 18 महिने में ही केंद्र सरकार की समझ मेंं शायद यह आ गया कि जीएसटी की मौजूदा दरें बाजार के स्वभाव के अनुरूप नहीं है और इससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है जबकि पैट्रोल एवं डीजल को सरकार जीएसटी के दायरे में लाने के लिए तैयार ही नहीं है। जाहिर है यदि ऐसा होता है तो पैट्रोल डीजल कीमतें कहीं कम हो जाऐंगी। बहरहाल देर से ही सही सरकार की समझ मेंं आ गया है कि वह कुछ भी जनता पर नहीं थोप सकते। जनता के पास वोट का अचूक हथियार है, जो सब कुछ बना-बिगाड़ सकता है, ठीक वैसे ही जैसा कि पांच राज्यों में हाल ही में दिखा। उस पर लोकसभा चुनाव सिर पर हों तो फिर अधिक जिद महंगी भी पड़ सकती है।

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