बुआ-बबुआ से डरी भाजपा

उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा के बीच गठबंधन क्या हुआ कि एकाएक देश की राजनीति गरमा गयी है। देश का पूरा राजनीतिक केन्द्रियकरण उत्तर प्रदेश में आकर टिक गया है। यहां तक कहा जाने लगा है कि गठबंधन से घबरा कर भाजपा ने तोते यानी सीबीआई को अखिलेश यादव के पीछे लगा दिया है जिससे कि उत्तर प्रदेश में गठंबधन की कोशिशों को प्रभावित किया जा सके। असल में सारा मामला तब शुरू हुआ जब गठबंधन की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए सबसे बड़ा चमत्कार हुआ। बुआ एवं बबुबा यानी कि मायावती एवं अखिलेश यादव ने आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर हाथ मिला लिया। जाहिर है दोनों दल उत्तर प्रदेश में बेहद मजबूत हैं और मध्य प्रदेश, राजस्तान एवं छत्तीसगढ में सामने आए चुनाव परिणामों के बाद भाजपा को अब कुछ डर तो गठबंधन से लगने लगा ही है। उत्तर प्रदेश में राजनीति इन दिनों सीबीआई के छापों के इर्द-गिर्द गरमा रही है। अखिलेश यादव के शासनकाल के समय आईएसएस अधिकारी बी चंद्रकला की भूमिका टेंडर जारी करने को लेकर अब उजागर हो रही है। खनन टेंडरों को लेकर आईएएस अधिकारी पर तो गिरफ्तारी की तलवार लटक ही गयी है साथ ही अखिलेश यादव को घेरने की भी सीबीआई भूमिका तैयार कर सकती हैं। अब इस पूरे मामले को सपा-बसपा के गठबंधन से जोड़ कर देखा जा रहा है। सीबीआई एकाएक क्यों सक्रिय हुई इस पर भी सवाल उठने लगा है। सुप्रीम कोर्ट तो पहले ही सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की संज्ञा दे चुका है और अब सीबीआई को पुन: केंद्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश में खनन टेंडरों की जांच के लिए प्रयोग करने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि इस जांच में एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है जिसमें नेताओं एवं नौकरशाहों के भ्रष्टाचार का कनेक्सन सामने आ सकता है, लेकिन सवाल इस बात पर उठ रहे हैं कि आखिर इस जांच को ठीक गठबंधन की घोषणा के बाद ही क्यों शुरू किया गया? भ्रष्टाचार को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार अब तक क्यों मौन धारण किए रही? जाहिर है कि तीन राज्यों में हुई हार के बाद भाजपा के खेमे में कहीं न कहीं अब डर तो व्याप्त हो ही गयी है। मिशन 2019 के परिणामों को लेकर भाजपा अब सशंकित नजर आ रही है। यही कारण है कि केंद्र ने सीबीआई को खनन टेंडरों की जांच करने के लिए ठीक चुनावों से पहले का समय चुना है, जबकि टेंडरों के घोटाले की जांच तो पहले ही शुरू की जा सकती थी। चूंकि नेताओं के कहने ही आईएएस चंद्रकला ने खनन पट्टों के टेंडरों को पास किया था और भ्रष्टाचार में से सीधे तौर पर लिप्त पाई गयी हैं। बावजूद इसके क्यों एक साल से अधिक समय से उत्तर प्रदेश सरकार चुप बैठी रही यह सोचने का विषय है। परिस्थितियां साफ बता रही हैं कि उत्तर प्रदेश में बुआ-बबुआ के मेल से भाजपा डरी नजर आ रही है और राजनीति में कहा जाता है कि परिस्थितियों के अनुसार सब कुछ जायज है।

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